कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल

कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य का फल

1) सूर्य के प्रथम भाव में प्रभाव को जानने से पहले हमें सूर्य और प्रथम‌ भाव के बारे में जानना होगा।

2) प्रथम भाव हमारे शारीरिक बनावट से संबंधित है। सूर्य एक शुष्क ग्रह, लाल रंग तथा अल्प केश होता है। इसलिए जब सूर्य प्रथम भाव में होता है तो जातक मूलतः दुबला पतला और लंबा देखने वाला हो सकता है। जातक के अल्प केस और शारीरिक रंग रूप में लालिमा लिए हुए हो सकता है। जातक के व्यक्तित्व में स्वभाविक रूप से नैसर्गिक चमक और चुंबकीय आकर्षण होता है।

3) प्रथम भाव हमारे स्वास्थ्य का है। सूर्य एक अग्नि तत्व के ग्रह है और यह पित्त दोष का कारणहै इसलिए जातक पित्त दोष से पीड़ित हो सकता है। इसलिए जातक बुखार और शारीरिक तापमान में वृद्धि इस तरह की समस्या से पीड़ित हो सकता है।

4) सूर्य और प्रथम भाव दोनों ही सिर के कारक हैं, इसलिए जब सूर्य प्रथम भाव से संबद्ध होता है तो जातक सिर और ब्रेन से संबंधित समस्या से पीड़ित रह सकता है लेकिन इसके लिए सूर्य प्रथम भाव में पीड़ित होना चाहिए।

5) सूर्य हड्डी का कारक है इसलिए यदि सूर्य प्रथम भाव में हो तो जातक हड्डी से संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। जातक दांतों से संबंधित समस्या है या तंत्रिका तंत्र से संबंधित समस्या से ग्रसित हो सकता है।

6) सूर्य नेत्र या दृष्टि का कारक है इसलिए प्रथम भाव में सूर्य नेत्रदृष्टि से संबंधित समस्या का कारण हो सकता है। मुझे लगता है कि यह द्वितीय भाव से 12 वीं में सुर्य के प्लेसमेंट के कारण हो सकता है जो कि आंखों की दृष्टि के लिए कारक ग्रह है।

7)प्रथम भाव मस्तिष्क का कारक होता है और सुरभि मस्तिक का कारक ग्रह है प्रथम भाव में सूर्य जातक के गरम मिजाज का कारण हो सकता है वह अपनी आक्रामकता और व्याकुलता या पेशेंस की कमी को आसानी से प्रदर्शित कर देगा

8)प्रथम भाव मस्तिष्क का कारक होता है और सुर्य भी मस्तिक का कारक ग्रह है । प्रथम भाव में सूर्य जातक के गरम मिजाज का कारण हो सकता है वह अपनी आक्रामकता और व्याकुलता या पेशेंस की कमी को आसानी से प्रदर्शित कर देगा।

9)सूर्य ग्रहों के राजा है। अतः प्रथम भाव में सूर्य के कारण जातक अपने आपको राजा के समतुल्य समझता है और वह राजा के समान व्यवहार करता है । वह स्वतंत्र स्वभाव का होता है वह किसी की अधिनता आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। वह थोड़ा घमंडी या ईगो वाला हो सकता है । वह दूसरों की सेवा करना पसंद नहीं करता है अपितु दूसरों से सेवा करवाना उसे पसंद है । वह आलसी प्रवृत्ति का हो सकता है । वह दूसरों पर शासन करना अपना अधिकार समझता है।

10)सूर्य एक नैसर्गिक क्रूर ग्रह है प्रथम भाव में सूर्य के होने के कारण जातक क्रूर प्रवृत्ति का हो सकता है ।वह ईष्यालू हो सकता है । वह अड़ियल या जिद्दी प्रवृत्ति का हो सकता है।

11)साथ ही सूर्य एक राजसिक ग्रह है अतः जातक दयालु और राजसिक स्वाभव वाला हो सकता है। जातक आधुनिक विचारों वाला हो सकता है जातक मस्तिष्क से सात्विक हो सकता है।

12)जातक नैसर्गिक रूप से लीडर और नेतृत्व की क्षमता से परिपूर्ण व्यक्ति होगा वह उन्नत विचारों वाला और एनर्जी या जोश से परिपूर्ण होगा वह बुद्धिमान और स्वभाविक रूप से अपनी हार को स्वीकार करने वाला कभी नहीं होगा।

13)सूर्य दंड नीति का कारक ग्रह अतः प्रथम भाव में सूर्य होने के कारण जातक दूसरों को के गलती या अपराध पर उसको दंड देना अपना अधिकार समझता होगा।

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