कुंडली के प्रथम भाव में द्वितीयेश का प्रभाव

कुंडली के प्रथम भाव में द्वितीयेश का प्रभाव

1)कुंडली के प्रथम भाव में द्वितीयेश का प्रभाव जानने के लिए सर्वप्रथम हम प्रथम भाव और द्वितीय भाव के नैसर्गिक कारक के संदर्भ में जानकारी प्राप्त करेंगे। द्वितीयेश प्रथम भाव में स्थित होकर द्वी – द्वादश संबंध का निर्माण करता है, अर्थात द्वितीय अपने भाव से बारहवें भाव में स्थित है। अतः प्रथम भाव का स्वामी जब द्वादश भाव में होता है तब इसका प्रभाव क्या होता है, इसके बारे में भी हमें जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

2) द्वितीय भाव धन से संबंधित होता है, जब द्वितीय भाव का स्वामी लग्न में स्थित हो तब जातक धनी और समृद्ध व्यक्ति होता है। क्योंकि द्वितीय भाव का स्वामी प्रथम भाव में है अतः जातक धन स्वयं की क्षमता और मेहनत के बदौलत अर्जित करेगा। जातक अपनी बुद्धि, ज्ञान, चतुराई और शारीरिक क्षमता के दम पर धन अर्जित करेगा।

3) द्वितीय भाव का स्वामी स्वयं से द्वादश भाव में स्थित है, यह धन का व्यय का भी संकेत देता है। लेकिन लग्न जातक से संबंधित होता है अतः जातक धन का व्यय स्वयं या खुद पर करेगा। अतः हम कह सकते हैं कि जातक को सभी प्रकार के सुख सुविधा प्राप्त होंगे और जातक लग्जरियस लाइफ स्टाइल का आनंद लेगा। लेकिन जातक अपने धन को किसी भी गैर जरूरी कामों में खर्च नहीं करेगा। जातक अपने धन को दूसरे के ऊपर भी खर्च नहीं करेगा। साधारण भाषा में हम कह सकते हैं कि जातक धन के संदर्भ में स्वार्थी और कंजूस प्रवृत्ति का होगा।

4) द्वितीय भाव वाणी से संबंधित होता है। द्वितीय भाव का स्वामी जब लग्न में हो तब जातक बातूनी हो सकता है। जातक अपने प्रमोशन में या खुद के बारे में बात करने में इंटरेस्ट लेने वाला व्यक्ति होगा। जातक को अपनी बड़ाई सुनना पसंद होगा। जातक की बोलने की कला अद्भुत होगी। जातक अपने वाणी के दम पर लोगों को आकर्षित करने में सक्षम होगा। यदि द्वितीयेश प्रथम भाव में पीड़ित हो तब जातक बोलने में या अपनी भावना को वचनों के द्वारा प्रकट करने में झिझक का सामना करेगा। जातक अपने वचन पर स्थिर नहीं होगा या जातक कटु वचन बोलने वाला हो सकता है।

5)द्वितीय भाव को मारक भाव भी माना जाता है अतः द्वितीयेश मारकेश होता है। यदि मारकेश लग्न में स्थित हो तब यह जातक के लिए शुभ नहीं माना जा सकता है। जातक को स्वास्थ्य से संबंधित समस्या हो सकती है। जातक की आयु के लिए भी द्वितियेश का लग्न में हो स्थित होना शुभ नहीं माना जा सकता है। यदि द्वितीयेश लग्न में पीड़ित हो तब यह जातक को निश्चित ही स्वास्थ्य से संबंधित समस्या देता है। यदि पीड़ित द्वितियेश पापी ग्रह से संबंधित हो तब यह निश्चित ही जातक के स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं माना जाएगा। यदि लग्न में स्थित द्वितीयेश दुः स्थान के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करें तब भी यह शुभ नहीं माना जाता है। यदि द्वितीय भाव का स्वामी लग्न में स्थित हो तब यह बुरे प्रभावों को कम करता है।

6) जैसा कि हम जानते हैं कि लग्नेश द्वादश भाव में जातक को कंफ्यूज स्वभाव का व्यक्ति बनाता है। और जब द्वितीयेश प्रथम भाव में स्थित हो तब हम कह सकते हैं कि जातक अपने धन के संदर्भ में चिंता से ग्रसित रहेगा। जातक अपने धन को लेकर बहुत ही ज्यादा संवेदनशील हो सकता है। जातक को अपने धन की नुकसान का भी भय हो सकता है। यदि इसी बात को हम मारकेश के संदर्भ में देखें, तब हम कह सकते हैं कि जातक को अपने जीवन या आयु पर भी संदेह रहेगा। जातक स्वयं की मृत्यु के भय से पीड़ित रह सकता है। जातक अपने शत्रु से भयभीत रह सकता है।

7) द्वितीय भाव नेत्र से संबंधित होता है। यदि द्वितीयेश लग्न में स्थित हो तब जातक को नेत्रों से संबंधित समस्या हो सकती है। यदि कुंडली में सूर्य चंद्रमा शुक्र जैसे नेत्र कारक ग्रह भी पीड़ित हो तब निश्चित ही जातक को नेत्र से संबंधित समस्या हो सकती है।

8) द्वितीय भाव परिवार से भी संबंधित होता है। यदि द्वितीयेश लग्न में स्थित हो तब जातक के अपने परिवार से मधुर संबंध होते हैं। लेकिन जातक अपने परिवार से अलगाव का सामना कर सकता है।

9) द्वितीय भाव संस्कार से संबंधित होता है, खासकर पारिवारिक संस्कार। यदि द्वितीय भाव का स्वामी लग्न में शुभ स्थिति में हो तब जातक की पारिवारिक संस्कार अच्छे होते हैं। यदि द्वितीय भाव का स्वामी लग्न में पीड़ित हो तब जातक को अपने परिवार से उचित संस्कार नहीं मिलते हैं।

10) यदि द्वितीय भाव का स्वामी प्रथम भाव में सूर्य से संबंध स्थापित करें और नवम भाव से संबंध स्थापित करें तब जातक को अपनी पैतृक संपत्ति प्राप्त होती है। यदि द्वितीय भाव का स्वामी लग्न में राहु या केतु से संबंध स्थापित करें तब जातक झूठे और धोखेबाज स्वभाव का हो सकता है। यदि द्वितीय भाव का स्वामी लग्न में शनि से संबंध स्थापित करें तब भी जातक के संस्कार अच्छे नहीं होते हैं। साथ ही राहु, केतु, शनि मंगल इत्यादि से संबंध स्थापित करने के कारण यह एक बली मारकेश बन जाता है।

11) द्वितीय भाव का स्वामी लग्न में हो तब जातक को एक से अधिक विवाह की संभावना होती है। सामान्यतः द्वितियेश शुभ स्थिति में लग्न में स्थित हो तो जातक धनी, समृद्ध और प्रसिद्ध व्यक्ति बनाता है। लेकिन द्वितीयेश प्रथम भाव में पीड़ित जातक को स्वास्थ्य से संबंधित समस्या, स्वभाव से झूठा और हाथ में कमी का अनुभव करता है।

12)यदि द्वितीयेश लग्नेश के साथ प्रथम भाव में स्थित हो तब यह एक उत्तम धन योग बनाता है। अतः जातक धनी समृद्ध और सभी प्रकार के सुख सुविधा का उपयोग करने वाला व्यक्ति होगा। जातक की ओरल नॉलेज बहुत ही अच्छी होगी। यदि द्वितीय लग्न भाव में पीड़ित हो तब जातक को स्वास्थ्य से संबंधित समस्या देगा।

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